पूरे परिवार ने त्याग दी सांसारिक मोह माया, 30 करोड़ रुपए की संपत्ति दान करके पूरे परिवार ने एक साथ ले ली दीक्षा

मनुष्य अपने जीवन में एक से बढ़कर एक नेक काम करता है लेकिन ऐसा कहा जाता है कि दान करना जीवन का सबसे अच्छा और फलदाई काम है. विभिन्न प्रकार के दान जैसे अन्य दान, विद्या दान, वस्त्र दान, धन दान और अभय दान यह सारे दान इंसान को पुण्य के भागी बनाते हैं.

ऐसा कहा जाता है कि दान करने से हमारे जीवन में तमाम तरह की समस्याएं खत्म हो जाती है लेकिन दान का फल तभी मिलता है जब हम उस दान को निस्वार्थ भाव से करते हैं. जो व्यक्ति बिना किसी लालच के दान करते हैं ईश्वर उसकी सारी इच्छाएं पूर्ण करते हैं.

इसी बीच देश के एक ऐसे दानवीर परिवार कि इन दिनों खूब चर्चा हो रही है जी हां आपको बता दें कि इस परिवार ने अपनी करोड़ों की संपत्ति दान कर ईश्वर की राह पर चलने का निर्णय लिया है. पूरे परिवार ने सांसारिक मोह माया को त्याग दिया है.

दरअसल यह परिवार अब अपने आराम की सुख सुविधाओं को त्याग कर कठिन रास्ते पर निकल पड़ा है. गुरुवार को जैन बगीचे में परिवार के मुखिया भूपेंद्र डाकलिया समेत पांच लोगों की भागवती दीक्षा दिलाई गई. आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ के दवा के कारोबार करने वाले डाकलिया परिवार ने लगभग 30 करोड़ की संपत्ति दान कर जैन धर्म के संस्कारों के तहत दीक्षा ले ली.

बता दे कि छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव के गंज चौक के रहने वाले 45 वर्षीय भूपेंद्र डाकिया के परिवार में दीक्षा लेने वाले मैं उनकी 45 वर्षीय पत्नी सपना डाकिया और उनके 3 बच्चे भी शामिल हैं. जिसमें 22 वर्षीय महिमा डाकलिया, 16 वर्ष के हर्षित डाकलिया, 18 वर्षीय देवेंद्र डाकलिया है.

भूपेंद्र का ऐसा बताना है कि उनकी करोड़ों की प्रॉपर्टी में जमीन, दुकान से लेकर अन्य संपत्तियां भी शामिल है. साल 2011 में रायपुर में स्थित केवल्यधाम जाने के बाद उनके मन में संन्यास लेने का ख्याल आया इसलिए उन्होंने अपने पूरे परिवार समेत ऐसो आराम की जिंदगी छोड़ कर दीक्षा लेने का निर्णय लिया. इसके बाद पूरा परिवार एक साथ सन्यास की तरफ चल पड़ा.

भूपेंद्र ने यह भी बताया कि कैवल्यधाम के दौरान हमारे सबसे छोटे बेटे हर्षित के मन में दीक्षा को लेने का भाव आया. उस वक्त उसकी उम्र महज 6 वर्ष की थी उन्होंने बताया कि हर्षित ने हंसते-हंसते गुरु के सानिध्य में अपना केश लोचन कराया था.

उन्होंने बताया कि यहीं से चारों बच्चों के मन में दीक्षा का भाव पैदा हुआ था. धाम से लौटने के बाद ही बच्चों ने दीक्षा लेने की बात कही. लेकिन कम उम्र होने के कारण उस समय दीक्षा नहीं ले सके. अब 10 साल के पश्चात उनके मन में पुनः दीक्षा का भाव बना हुआ देख मैंने उनके निर्णय पर सहमति दे दी.