बुजुर्ग पिता ने संजोया था सपना, मृत्यु हुई तो बेटे ने श्राद्ध भोज के बजाय गांव के लिए बनवाया पुल

आज सोशल मीडिया के माध्यम से देश विदेश की खबरें चंद मिनटों में देखने और सुनने को मिल जाती है. एक ऐसा ही मामला बिहार के मधुबनी जिले से सामने आया है जिसकी हर तरफ चर्चा हो रही है. आपको बता दें पुल बनवाने वालेे सुधीर झा ने कहा कि उनकी पिता की अंतिम इच्छा थी कि उनके निधन के बाद श्राद्ध भोज और कर्मकांड पर लाखों रुपए खर्च करने के बजाय गांव के लिए ही कुछ करें और गांव के लिए पुल का निर्माण करवाएं. सुधीर झा ने अपने देवकांत पिता के सपनों को साकार करते हुए गांव की सड़क पर 5 लाख रुपए की लागत से पुल का निर्माण करवाया है.

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आज के समय में गांव के लोग अच्छी सड़क, पुल से वंचित रह जाते हैं जिसके लिए उन्हें सामूहिक समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास या फिर सरकारी सिस्टम की ओर ताकना पड़ता है. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सामूहिक समस्या को भी निजी प्रयासों से ही दूर करने का जज्बा रखते हैं. कुछ ऐसे ही तस्वीर सामने आई है बिहार के मधुबनी जिले से.. मधुबनी जिले के कलुआही प्रखंड के नरार पंचायत के वार्ड नंबर 2 में गांव की सड़क पर फूल नहीं होने से बरसात के मौसम में ग्रामीणों ने इस समस्या को निजी तौर पर लेते हुए ना केवल हल किया बल्कि 5 लाख रुपए की लागत से पुल का निर्माण भी करवा दिया.

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ग्रामीणों की परेशानी देख गांव के बुजुर्ग महादेव ने निजी प्रयासों से इस समस्या का समाधान करने का सपना संजोया था. समाज को एक नई राह दिखाते हुए उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे सुधीर झा से कहा कि उनके निधन के बाद श्राद्ध भोज और कर्मकांड के ऊपर लाखों रुपए खर्च करने की बजाय गांव की सड़क पर पुल का निर्माण करवाएं. हालांकि सुधीर झा ने अपने पिता के सपने को साकार करते हुए गांव की सड़क पर 5 लाख रुपए की लागत से पुल का निर्माण करवाया है.

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दिवगंत महादेव झां की पत्नी महेश्वरी देवी का कहना है कि उनके पति पेशे से शिक्षक रहे हैं. उनके पति का साल 2020 में देहांत हो गया. उनकी इच्छा अनुसार परिवार के लोगों ने श्राद्ध भोज पर पैसे ना खर्च करके सड़क पर फूल बनवाना मुनासिब समझा.

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दिवगंत महादेव झा के छोटे भाई महावीर झा का कहना है कि गांव की सड़क पर पुल बन जाने से यहां से गुजरने वाले राहगीरों को काफी राहत मिली है. खासकर किसानों को अब कमर तक पानी में तैर कर अपने खेत पहुंचने की जरूरत नहीं होती. दिवगंत महादेव झा और उनके परिजनों ने इस बात को सच कर दिखाया कि सरकारी सिस्टम को कोसते रहने की वजह निजी प्रयासों से भी समाज की दशा और दिशा बदली जा सकती है.